और मैने complaint कर ही दी
“लालच बुरी बला है”, ऐसा कई बार सुना है. आपने भी सुना होगा. फिर भी कुछ लोग लालचवश अपना तो अपना, दुसरों का भी नुकसान कर बैठते हैं. 8-अक्टुबर को किसी कारणवश रांची जाना पडा. 9-अक्टुबर को सुबह रांची पहुँचा. जिस काम के लिये गया था वो किया. शाम को वापसी की टिकट वेटलिस्ट से RAC तक आकर अटक गई थी. ट्रेन थी रांची – नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस. भारतीय रेलवे से अपना काफी पुराना सबंध है अतः राजधानी एक्सप्रेस में मिलने वाली सुविधाओं (?) की जानकारी भी है.
हुआ यों कि रांची से चलते समय तक टिकट RAC से आगे नही बढ पाया था. वापस लौटना जरूरी था. यह सोच कर चढ गया कि कम से कम बैठने की सीट तो मिलेगी ही. चुंकि टिकट RAC था तो सीट पर एक और सहयात्री था. तभी एक तीसरे सज्जन ने आ कर उसी सीट पर अपनी तशरीफ का टोकरा टिका दिया. मै और मेरा सहयात्री दोनो चकरा गये. इन सज्जन से पूछा तो गोलमोल जवाब देकर वही टिके रहे. लगा कि टी. टी. थोडी देर में आ जायेगा, तभी मामला पता चल जायेगा. टाइम काटने के लिये एक किताब खोल ली. टी. टी. के आने से पहले ही खान-पान सेवा में लगे वेटरों ने अपना काम शुरू कर दिया. सबसे पहले पानी की बोतल बाँटने लगे. हमारी सीट पर आकर तीन यात्री देखकर वो भी चक्कर खा गया. मैंने और दुसरे सहयात्री ने बताया कि RAC टिकट है तो उसने हमे एक-एक बोतल थमा दी. तीसरे सज्जन ने अपना टिकट ही वेटर को थमा दिया कि इसमें सीट नबंर देख लें. वो सज्जन तो अपने मोबाइल पर बात करने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त थे. वेटर कुछ देर तो टिकट को उलट-पुलट कर देखता रहा कि वेटिंग लिस्ट का टिकट है, शायद कहीं हाथ से सीट नबंर लिखा हो. लेकिन उस टिकट पर कोई सीट नबंर लिखा होता तो उसको नजर आता. आखिर में वो टिकट उस यात्री को वापस थमा कर उसे बिना पानी की बोतल दिये चला गया.
पह्ली रात सफर में गुजरी थी, फिर दिन भर की भाग-दौड, उस पर एक साईड बर्थ पर बैठे तीन लोग. मन ही मन कोफ्त हो रही थी कि मुआ टी. टी. अभी तक क्यों नही आया. टी. टी. की प्रतीक्षा इस उम्मीद में भी थी कि शायद कोई बर्थ खाली मिल जाये और अपन आधी बर्थ के बदले पुरी बर्थ पर आराम से पसर सकें. तभी वेटर ने नाशता देना शुरू कर दिया. अमुमन एक कोच में दो वेटर होते हैं. नाशता दे रहा वेटर पानी देने वाले वेटर से अलग था और उस को हमारी बर्थ के गोलमाल मामले की जानकारी नही थी. उसने मेरे सहयात्री (RAC टिकट वाले) को नाश्ते की ट्रे थमायी. फिर मुझे थमायी. उसके बाद पुछ्ने लगा कि इस बर्थ पर तीन यात्री कैसे? जैसे ही मेरे मुँह से निकला कि RAC टिकट है. उसने दन से मेरे हाथ से ट्रे वापस छीनी और किसी और यात्री को थमा दी. गोया कि मै कोई चोर हुँ जिसने उसकी ट्रे चुरा ली थी. कुछ क्षण तो समझ में नही आया कि ये हुआ क्या. लग रहा था कि हर कोई मुझे देख कर हँस रहा हो. मैंने अपना सिर किताब में गडा दिया, लेकिन दिमाग अभी भी सोच रहा था कि ये हुआ क्या?. थोडी देर बाद वेटर ने चाय – कॉफी सर्व करनी शुरू की. पुरे डिब्बे के यात्री नाशते से फारिग हो कर चाय – कॉफी का आनंद उठा रहे थे. घर से चलते समय लगा था कि राजधानी एक्सप्रेस का सफर है तो क्यों घर से खाने-पीने के सामान का बोझ लादा जाय. और अब तो मेरे पेट में चुहों ने दौड लगानी शुरू कर दी थी. तब तक टी. टी. भी आकर जा चुका था. तीसरे यात्री महोदय वेटिंग लिस्ट टिकट होते हुए भी हमारी सीट पर टिके हुए थे. नियमानुसार राजधानी एक्सप्रेस में वेटिंग लिस्ट यात्रीयों को सफर की इजाजत नही. पर लग रहा था कि इन सज्जन ने टी. टी. से कोई सैटिंग कर ली थी जो वो भी चुपचाप बिना कुछ बोले आगे निकल चुका था. हम दोनो सहयात्रियों ने तीसरे सज्जन से बात करने की कोशिश की तो मोबाइल पर बात करते होने का बहाना करके वो हमे अनसुना कर गया. खीज बढती जा रही थी.
कुछ देर बाद उठकर वेटर के पास गया, पूछा कि भाई तुमने मेरे हाथ से नाशते की ट्रे भी ले ली और फिर चाय – कॉफी भी नही दी. माजरा क्या है? वो बोला कि आप एक सीट पर दो RAC टिकट वाले यात्री हो तो एक ही यात्री को खाने पीने का सामान मिलेगा. मैंने कहा कि अगर एक ही यात्री को खाने पीने का सामान मिलेगा तो इसका निर्णय कौन करेगा कि दोनो में से किस यात्री को यह सुविधा मिलेगी और किसे नही. वेटर बोला, पैसे लगेगें आपके लिये भी सारी सुविधाओं का इंतजाम हो जायेगा. समझ तो आ रहा था कि वो मेरी जेब हल्की करके अपनी जेब का वजन बढाना चाह रहा था. अपने दिमाग का तापमान उपर की ओर बढने लगा. फिर भी वेटर को दोबारा पूछा कि भाई सही बता कि यह निर्णय कौन करेगा कि दोनो में से किस यात्री को यह सुविधा मिलेगी और किसे नही. और साथ ही यह बता कि यह नियम कब से लागु हुआ है कि अगर एक बर्थ पर दो RAC यात्री हो तो खान-पान की सुविधायें एक ही यात्री के लिये होंगी और दुसरे को पैसा देना पडेगा. उसने कहा कि आप कैटरिंग मैनेजर से बात करो. मैनेजर ने जिस हिसाब से सप्लाई दी है, उसी हिसाब से उसने यात्रियों को सामान बाँटा है. दिमागी तापमान को नियंत्रण मे करते हुए मैने फिर एक बार वेटर को पुछा कि क्या वो सही मे चाहता है कि मैं कैटरिंग मैनेजर से बात करूं. तो पट्ठा ताव दिखाता बोला कि हाँ, हाँ उन्ही से बात करो. अब खुद को काबु में रख पाना असम्भव हो गया था. तभी सामने से टी. टी. आता दिख गया. उसको बोला कि सर जी, Complaint Book चाहिये. उसने उल्टा मेरे पर सवाल दाग दिया. Complaint Book का क्या करोगे? जो भी problem है बताओ, solve करवा देते है. इसी तरीके का अनुभव जुलाई में Bangalore यात्रा के दौरान हो चुका था (उस अनुभव को भी आगे किसी पोस्ट में साझा करूंगा). मैने टी. टी. को सारी बाते बताई तो उसने वेटर को झाड लगायी. वेटर कहने लगा कि उसको मैनेजर ने सप्लाई कम दी है. टी. टी. ने कहा कि वो मैनेजर से बात कर लेगा और तुरंत नाश्ता तथा चाय-कॉफी ला कर मुझे दे. Bangalore की घटना में टी. टी. की बातों में आकर मै complaint करते करते रूक गया था, लेकिन इस बार हाथ से अन्न छिन लिये जाने का घाव कुछ गहरा था. टी. टी. को कहा कि वो नाशते की बातो को भुल जाये और complaint book मेरी सीट पर भिजवाने का इंतजाम करें. मै वापस अपनी सीट पर पहँच चुका था. दिमाग का तापमान थोडा नियंत्रण से बाहर आ चुका था, आते ही तीसरे सहयात्री को नाप लिया कि भईये, बहुत हुआ. इस सीट से अपनी तशरीफ का टोकरा उठा कर कहीं और ले जाओ. उसने बाते बनाने की कोशिश की लेकिन अब दुसरे वाला सहयात्री भी भड़क चुका था. मजबुरन इन महोदय ने यहाँ से खिसक लेने मे भलाई जानी. तभी टी. टी. महोदय आ टपके. कहने लगे कि दुसरे कोच में एक सीट खाली है क्योंकि उसका यात्री जो रांची से चढना था, अभी तक आया नही है. नियमानुसार तो उस यात्री का अगले स्टेशन तक इंतजार करने के बाद ही उसकी सीट को RAC टिकट वाले यात्रियों को दिया जा सकता है. लेकिन हमारी परेशानी को देखते हुए वह अभी उस सीट को हमे दे रहा है.
अबकी बार नजला उतरने की बारी टी. टी. पर आयी. हुआ यों था कि रेलवे प्रशासन ने किसी कारणवश ट्रेन का रूट (बरकाकाना – मुगलसराय के बदले बोकरो – गया – मुगलसराय) बदल दिया था. अब नये रूट पर रांची से नही चढे यात्री के आने का कोई सवाल ही ना था. खैर हल्के से टी. टी. को इस नये रूट की याद दिलायी तो आगे कुछ ना बोलते हुए उसने एक बर्थ दे दी. पुरी बर्थ मिलने की खुशी में complaint करने की जो चिंगारी दबने लगी थी, टी. टी. की बातों ने उसे फिर हवा दे दी थी. उसे दोबारा याद दिलाया कि ना ही complaint book आयी है और ना ही catering manager. सहयात्री थोडा समझदार था, बोला आप इसी सीट पर टिको और complaint जरूर करना. तभी वेटर आकर कहने लगा कि एक मिनट साईड में आ जाइये, मैनेजर आये हैं और कुछ बात करना चाहते है. तुरंत उसको लताड लगायी कि मैनेजर को यही भेजो. खैर मैनेजर सीट पर आ गया. उसका भी अंदाज यही था कि शिकायत मत लिखो, रास्ते भर सेवा करते चलेंगे. लेकिन अपने रिकार्ड की सुई तो एक ही जगह अटकी थी कि शिकायत तो लिखनी है, फिर चाहे तुम रास्ते भर कुछ मत देना. मिन्नतें कर के वो चला गया कि शिकायत पुस्तिका भेज रहा है. थोडी देर बाद दोनो वेटर आकर वही राग अलापने लगे कि जनाब शिकायत मत लिखो, रास्ते भर सेवा करते चलेंगे, किसी शिकायत का मौका न देंगे. लेकिन इस बार तो जैसे घाव इतना गहरा था कि इन मिन्न्तों का असर उल्टा हो रहा था. एक तो हाथ से अन्न का छीन लिया जाना, फिर वेटर द्वारा पैसों की मांग, फिर टी. टी. द्वारा problem solve कर दिये जाने की पेशकश और बाद मे नियमों का हवाला देते हुए एह्सान सा जताते हुए बर्थ देना, वेटिंग लिस्ट वाले यात्री का कहीं और जाने के निवेदन को अनसुना कर देना – कुछ दो – तीन घंटो के वक्फे में दिमाग अपनी जगह से बुरी तरह हिल चुका था.
आखिर मे झक मार कर वेटर ने शिकायत पुस्तिका सामने रख दी, जिसे वो अभी तक एक अखबार में लपेटे, बगल में दबाये इस आस में खडा था कि शायद वो मुझे शिकायत ना लिखने के लिये मनाने में कामयाब हो जाये. Complaint book देखी तो पिछ्ले तीन महीनों मे एक ही शिकायत दर्ज थी जो कि खाने की खराब क्वालिटी के बारे में थी. खैर मैने अपनी शिकायत लिखी. उसके बाद सुबह दिल्ली पहुँचने तक सब कुछ बढिया बढिया रहा. दिल्ली स्टेशन से कुछ पहले दुसरा एक वेटर आया और फिर अपना राग शुरू कर दिया कि नौकरी चली जायेगी, शिकायत वापस ले लो. मैने पुछा कि अब तो शिकायत लिखी जा चुकी है, अब कैसे वापस होगी. इस पर पट्ठा बोला कि आप एक बार हाँ कर दो, शिकायता तो रद्द हो जायेगी. लेकिन मेरी ऑखों के सामने फिर वही दृश्य घुमने लगा और मेरा सिर इंकार मे हिल उठा. इस तरह आखिर मैने complaint कर ही दी.
पुनश्चः ये तो एक छोटा सा नमुना था राजधानी एक्सप्रेस मे सुविधाओं के गिरते स्तर का. इसी ट्रेन में बाथरूम गंदे होना, सडांध आना, बेडिंग के साथ तोलिया ना होना, खाने में चम्मच छुरी का पैक ना रहना, अनाउंसमेंट का साफ ना सुनाई देना, वेटिंग लिस्ट यात्रियों का टी. टी. की मिलीभगता से सफर करना आदि जैसी कई अन्य कमियाँ थी जिनको नजरअंदाज करना मजबुरी हो जाती है. वैसे तो अभी तक मैने नई दिल्ली – कोलकाता, नई दिल्ली – बंगलौर, नई दिल्ली -मुबंई, नई दिल्ली – रांची का सफर राजधानी एक्सप्रेस से किया है, लेकिन नई दिल्ली -मुबंई से बेहतर अनुभव मुझे और किसी राजधानी में नही हुआ (इसकी गाथा भी कभी आपसे साझा करूंगा).
| Print article | This entry was posted by ajay on October 14, 2010 at 15:13, and is filed under All from Mind. Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |

about 1 year ago
this is the scenario of all the facilities all around india.
in private sector too such problems occur.
about 1 year ago
आपने बिल्कुल ठीक किया शिकायत कर के। आगे संभव है कि इस तरह की घृष्टता न करें कर्मचारीगण।
about 1 year ago
TUMKO vastav me lagta ha ki age se aisa nahi hoga?
Ek din nahi khaoge to mar nahi jaoge..
Bharat me to log kai kai din nahi khate ha yar..
muje to shikayat ha itni bhookmari garibi dekh kar .. adhe se jyada bharat bhooka nanga ha gao me jaker dekho..wo kisko shikayat kare..
me ye nahi kaha raha hoo ki shikayat karke galat kiya .. lekin shikayat karke itni hai toba machane ki jarurat shayad nahi thee.
about 1 year ago
@अतुल एंव @प्रवीण – धन्यवाद आपके विचारों के लिए
@महेंद्र – आपको भी साधुवाद अपने विचारों को प्रकट करने के लिये. आपने बिलकुल सही कहा कि एक दिन नहीं खाओगे तो मर नहीं जाओगे. इसका अनुभव मैंने हाल ही में ११ दिनों के उपवास के दौरान किया था. (आपकी जानकारी के लिए जैन उपवास, नवरात्रों के उपवास या रमजान के रोज़ो से ज्यादा कठिन है). और अगर आप मेरे लिखे को दोबारा पढेंगे तो पायेंगे कि हाय- तौबा शिकायत करने के पहले मचानी पड़ी थी, उसके बाद सुबह दिल्ली पहुँचने तक सब कुछ बढिया बढिया रहा.
about 1 year ago
acha kiya jo aapne complain ki kuch to frk padega isse.
about 1 year ago
नीलम जी, अपनी अगली किसी पोस्ट में बताऊंगा इस शिकायत का असली असर क्या हुआ. मुझे भी पिछले हफ्ते ही पता चला है.